आओ- ना फिर से तुम
संगम पब्लिकेशन
आओ-ना फिर से तुम
काव्य संग्रह
लेखक:-
ओम प्रकाश लववंशी “संगम"
ISBN 978-1-63886-031-0
कॉपीराइट.2021
ओम प्रकाश लववंशी “संगम"
संगम प्रकाशन
सर्वाधिकार सुरक्षित।
इस पुस्तक का कोई भी हिस्सा लेखक की अनुमति के बिना किसी भी माध्यम में पुनःप्रकाशित नहीं किया जा सकता है।
कवर डिजाइनर-
एडिटर - मनीष लववंशी , ओम प्रकाश लववंशी , अनिल लववंशी
अनुक्रमणिका
क्रम सं. | शीर्षक | पेज नं. |
भूमिका , समर्पित | ||
1 | माँ चर्मण्यवती | 12 |
2 | हमको मंजिल पाना हैं | 13 |
3 | लक्ष्य पाना है | 14 |
4 | लोग कुछ भी कहेंगे | 15 |
5 | संघर्षरत | 16 |
6 | खतरनाक वक़्त | 18 |
7 | जरा इस तरह सोचो | 19 |
8 | तू चल | 20 |
9 | अकेले चलो | 21 |
10 | नींव भरने दो | 22 |
11 | आशा | 23 |
12 | हम फिर आयेंगे | 24 |
13 | प्रेम एक साधना | 26 |
14 | प्रेम कविताएं | 27 |
15 | प्रेम पत्र | 29 |
16 | प्रेम | 30 |
17 | मेरे कान्हा | 31 |
18 | बंशी चूम गयी | 32 |
19 | माँ | 33 |
20 | पिता | 34 |
21 | बेकसूर बेटियाँ | 35 |
22 | परिवर्तन अब हो | 37 |
23 | घर से दूर | 38 |
24 | खेतों की महक | 39 |
25 | महाराणा प्रताप | 40 |
26 | बचपन | 42 |
27 | बचपन की यादें | 43 |
28 | बचपन के दिन | 44 |
29 | बचपन वाले खेल | 45 |
30 | मैं बदल जाऊँगा | 46 |
31 | डायरी लिखता हूँ | 48 |
32 | कविता | 49 |
33 | आओ-ना फिर से तुम | 50 |
34 | आओ-ना फिर से तुम | 51 |
35 | आओ-ना फिर से तुम | 52 |
36 | आओ-ना फिर से तुम | 53 |
37 | आओ-ना फिर से तुम | 54 |
38 | आओ-ना फिर से तुम | 55 |
39 | लौट आओ | 57 |
40 | मासूम मन | 58 |
41 | सावन आया | 59 |
42 | तुम्हें याद करता हूँ | 60 |
43 | खेत पर | 61 |
44 | अमलतास के फूल | 62 |
45 | चाय पिला देते है | 63 |
46 | कह दो | 64 |
47 | कहाँ गई हो | 65 |
48 | गुड़ नाईट कहे बगैर | 66 |
49 | गुलाब | 67 |
50 | कॉलेज के केंटीन में | 68 |
51 | शरमाते भी हो | 69 |
52 | कॉलेज वाले दिन | 70 |
53 | हाँ, मैं बदल गया हूँ | 71 |
54 | कभी सोचना | 72 |
55 | फिर से आओगे | 73 |
56 | एक तितली | 74 |
57 | महोब्बत करता हूँ | 75 |
58 | काफ़ी वक्त | 76 |
59 | तुम्हारे हिस्से की चाय | 77 |
60 | सर्दी की गुनगुनी धूप | 79 |
61 | दिल में बसा लो | 81 |
62 | आज उनसे मिलना है | 82 |
63 | ये प्यार नही तो क्या है | 83 |
64 | इश्क़ वाली चाय | 84 |
65 | कौन हो तुम? | 86 |
66 | चंचल नींद | 87 |
67 | अपना मानता हूँ तुम्हें | 88 |
68 | हाँ, तुम | 89 |
69 | तुमसे एक बात कहनी है | 90 |
70 | तुम नाराज हो जाती हो | 91 |
71 | पुरानी ऐनक | 92 |
72 | आज उनसे बात हुईं | 93 |
73 | संगम से इंकार | 94 |
74 | कोई कुछ भी कहे | 95 |
75 | इश्क़ तुमसे है | 96 |
76 | तुम दुर क्यों जाते | 97 |
77 | ऑन चैट मिले | 99 |
78 | गले मिलेंगे हम | 100 |
79 | धूप में बैठने लगा हूँ | 101 |
80 | नया सफ़र | 102 |
81 | पागल लड़का | 103 |
82 | अच्छा नहीं लगता | 104 |
83 | धीरे-धीरे | 105 |
84 | उसके शहर की | 106 |
भूमिका
प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कुछ लम्हें इस तरह से गुजर जाते हैं जिनको वह फिर से जीना चाहता है।
उन लम्हों को आजीवन याद रखना चाहता है।
रचनाकार ने बीते लम्हों को लेखनी के माध्यम से काव्य विधा में ढ़ालकर एक पुस्तक का रूप दिया है। काव्य संग्रह 'आओ-ना फिर से तुम' में बचपन,गाँव,बारिश,सावन,स्कूल,प्रेम,दोस्ती,खेतों में लहराती फसलों के इर्द-गिर्द घूमती हुई कविताओं के साथ ही नारी जागरूकता और प्रेरणात्मक कविताएं शामिल हैं।
किस तरह विज्ञान के युग में बचपन खोता जा रहा हैं। छात्र किस तरह से अपने सपनों को पूरा करने के लिए घर से दूर रहता है तब उसको घर की याद आती हैं, अपने बचपन के दोस्तों को कैसे याद करता है उनको फिर से गाँव बुलाता है और फिर से बचपन में खो जाना चाहता है।।
समर्पित
जीवन देने वाली,संस्कार का संचार करने वाली,
हमेशा आशीर्वाद रखने वाली प्रथम गुरु माँ ,
संघर्ष और त्याग का दूसरा नाम पिताजी और
मार्गदर्शन करने वाले गुरुओं को
यह पुस्तक समर्पित करता हूँ।
1. माँ चर्मण्यवती के चरणों में
माँ चर्मण्यवती के चरणों में शीश झुकाने आया हूँ ,
हे कोटा के सिद्धिविनायक शिक्षक बनने आया हूँ ।
माँ सरस्वती के चरणों में खाली मस्तक लाया हूँ ,
ज्ञानार्जन करने तेरे आंगन में कॉपी पेन लाया हूँ ।
मेरे संजोये सपनों को मैं साकार करने आया हूँ ,
दिल में बसे ख्वाबों को मैं आकार देने आया हूँ ।
माँ सरस्वती तेरे आंगन में शिक्षा पाने आया हूँ,
मेरे बढ़ते हौसलों को नई उड़ान देने आया हूँ ।
रहकर माँ भारती के चरणों में अंबर छूने आया हूँ ,
सत्कर्मों से गुरु,मात-पिता का नाम करने आया हूँ ।
हाड़ौती का बेटा हूँ अपनी पहचान बनाने आया हूँ,
हे माँ शारदे तेरे चरणों में एक प्रार्थना लाया हूँ ।
राह मुझको दिखा दे माँ मंजिल पाने आया हूँ,
माँ चर्मण्यवती के चरणों में शीश झुकाने आया हूँ ।।
2. हमको मंजिल पाना हैं
कोशिशें कभी कम ना होगी
छोटी हार से
आँखे नम ना होगी,
जारी है सफ़र हमारा
चाहत मंजिल से कम ना होगी।
कहने वाले तो
कुछ भी कहते हैं,
मंजिल के लिए ही तो
हम सारे दर्द सहते हैं।
हमें पता हैं
हमको क्या करना हैं?
फिर फालतू की
बातों से क्यों डरना हैं।
पैर भी फिसलेंगे
साँसे भी फूलेगी
लेकिन हमने जो ठान लिया
वो तो करना हैं,
हमको मंजिल पाना हैं।
हमको मंजिल पाना हैं।
3. लक्ष्य पाना है
जब तूने लक्ष्य बना ही लिया
तो अब क्यों रुकता हैं,
जब ऊपर उठना ही हैं
तो अब क्यों झुकता हैं।
ठान लिया मन में, अब मंजिल पाना हैं,
करते करते अभ्यास, सब हल पाना हैं,
वक़्त भी अब ज्यादा शेष नहीं
परिस्थितियां भी तेरी विशेष नहीं,
तू सारा ध्यान लगा लक्ष्य पर
सारी विचलित बातें बिसरा कर,
तेरी टक्कर में कोई आ न सके
तू विविध ज्ञान का पहरा कर।
दिन-रात एक करना होगा
संघर्षों को भी सहना होगा
मेहनत में कोई कमी ना रहे
क़िताबों में तुझको खोना होगा!
4. लोग कुछ भी कहेंगे
दुनिया हैं कुछ भी कहेगी
तुमको नहीं सुनना है।
जो रास्ते तुम्हारी मंजिल तक जाते हैं,
तुमको उन पर पर ही चलना है।
तुम्हें भ्रमित करने को
रास्ते पर मिलेंगे कई लोग
तरह-तरह की बातें कहेंगे कई लोग।
उनको पचता नहीं
तुम्हारा इस तरह से चलना ,
उनकी बातों पर ध्यान
तुम कभी ना देना।
कुछ भी कहते हैं तो कहने दो
विचलित होकर मत घबराना।
तुम्हारा काम है मंजिल के लिए चलना,
तुम चलना , निरंतर चलते रहना।।
5. संघर्षरत
हम संघर्ष कर रहे हैं न
हार कर चुप तो नहीं बैठे,
फिर ज्यादा ज्ञान क्यों बाँटते
हमसे नहीं सुना जाता....।
हाँ, हो जाती हैं गलतियाँ सबसे
मनुष्य हैं, भगवान थोड़े हैं
कहा भी गया हैं,
मनुज गलतियों का पुतला हैं
ये अक्सर हो ही जाती हैं।
हुई हैं तो स्वीकार करते हैं
सुधारेंगे अपनेआप को
करेंगे इम्प्रोव खुद को
सीखेंगे कुछ और नया
जीवन की कलाएं
और सबक भी
पुरानी गलतियों से
और कहा भी गया हैं,
हमारी अंतिम गलती
हमारा अच्छा शिक्षक होती हैं।
जीवन में जिसने
एक भी गलती नहीं की
या तो वो भगवान हैं
या उसने कुछ करने की
कोशिश ही नहीं की ।
फिर मुझसे भी तो
गलती होना स्वाभाविक थी,
मैं भी तो एक इंसान हूँ
मैंने कोशिश तो की थी ।
मैं मैदान छोड़कर
भागा तो कतई नहीं हूँ,
अभी भी डटा हुआ हूँ
फिर मुझको कैसे तुम
असफल कह सकते हो ।।
6. खतरनाक वक्त
अपने अपनों के
सपनों पर खरा न उतर पाना
कितना दुःखदायी होता है।
मन की पीड़ा बोझ बनकर
कचोटती है दिन-रात ,
मस्तिष्क झंझावत करने लगता है।
जब उसको कोई हल नहीं मिलता तो
कुंठा,भग्नाशा की ओर बढ़ता है,
यह वक्त बहुत खतरनाक होता है
खुद को संभाल पाना
मुश्किलों का तूफान लगता है।
पर हाँ, संभालना तो पड़ेगा
बढ़ते कदमों को
सही दिशा तो देनी पड़ेगी,
ऐसे वक्त में सहज होना
कितना कठिन लगता है।
सपना पूरा करने के लिए
फिर से पूरे जोश से
शुरुआत करनी होगी ।।
7. जरा इस तरह सोचों
जिसे हम पाना चाहते हैं, जिसे हम लाइक करते हैं,
उससे हम महोब्बत करते हैं, प्यार करते हैं,इश्क़ करते हैं!
हर वक़्त उसी में डूबे रहते हैं, दिन-रात उसे याद करते हैं,
उससे बढकर कोई नहीं होता हैं, हमारी लाइफ में.......!
जब हम प्यार करते हैं तो पॉजिटिव एटीट्यूड रखते हैं,
अब जरा इस तरह सोचों.......
हमारी स्टडी भी तो हमारा लाइफ टाइम साथ देगी,
ये REET भी तो हमारी जिंदगी सँवारेगी,
क्यों न इसी से महोब्बत कर ले, इसी को सारा वक़्त दे!
इसकी आशिक़ी में खो जाये, इसकी चाहत भर ले दिल में,
इसे ही अपनी दीवानी बना लें इसकी दीवानगी में खो जाये!
अपना पॉजिटिव एटीट्यूड, पॉजिटिव एनर्जी सब लगा दे! एक दिन ये तुम्हारी हो जायेगी और जिंदगी बदल जायेगी!
8. तू चल
तू अनजान भले हो पर तू चल
चाहे राह तेरी टेढ़ी हो या सरल
पर तू चल,
चलेगा तो होगा सफल
बैठकर यूं ही क्या निकलेगा हल,
जिंदगी में उलझने तो आना ही है,
आज नहीं तो कल मंजिल पाना ही है।
और तूने खुली आँखों में सपने बुने हैं,
ख्वाबों वाले सपने किसको मिले हैं।
जो तू चल रहा है यह भी कम नहीं है,
उम्मीदों की चमक हैं आँखों में,
कोई गम नहीं है।
तू चल ,चलता रह....
रुक मत, निरंतर चलता रह ।।
9. अकेले चलो
जब कोई भी तुम्हारा साथ ना दे
तब तुम अकेले चलो
खुद नया रास्ता बनाओ
और उस पर निरंतर चलो
थकना नहीं है रुकना नहीं है।
तुम एक न एक दिन
मंजिल जरूर पाओगे
और फिर लोग चलेंगे,
तुम्हारे बनाए उन्हीं रास्तों पर
जिन पर चलकर तुम आगे बढ़े हो।
तुम्हारे कदमों के निशानों पर
कदम रखकर आगे बढ़ेंगे
और आखिर वो भी पा जाएंगे मंजिल।।
10. नींव भरने दो
जो जलते हैं उनको जलने दो ,
मैं मुसाफिर हूँ मुझको चलने दो ।
तुम फेंखते रहो पत्थर मेरे रास्ते में ,
मैं ठोकरें खाकर गिरने वाला नहीं हूँ ।
तुमने तुम्हारा काम कर दिया ,
पत्थरों को भी फर्ज अदा करने दो ।
मुझे मेरी मंजिल तक पहुँचना है ,
उठाकर इन्हीं पत्थरों से नींव भरने दो ।
तुमने मेरा काम आसान कर दिया,
गलती से मुझ पर एहसान कर दिया ।
तो फिर मैं भी फर्ज अदा कर दूंगा,
मंजिल पर एक मंजिल ज्यादा कर दूंगा ।
11. आशा
आशा एक बहुत ही छोटा शब्द हैं,
लेकिन इसके मायनें बड़े कमाल के हैं।
अंधेरे में जुगनू से उजाले की आशा,
नदी में डूबते हुए को तिनके की आशा।
असफल व्यक्ति को सफलता की आशा,
गिरते हुए बच्चे को चलने की आशा ।
चिड़ियाँ के बच्चे को उड़ने की आशा,
थके हुए राही को मंजिल पाने की आशा।
हर दुःख के बाद सुख पाने की आशा,
हर गम के बाद खुश रहने की आशा।।
12. हम फिर आयेंगे
हमने कब कोटा छोड़ा था?
शिक्षा से कब मुँह मोड़ा था?
हमको तो यहाँ डराया गया था,
कमरा खाली कराया गया था।
जिन मकान वालों की तारीफ़े
हम करते थे जाकर अपने घर
उन्होंने ही हमको किया था बेघर,
लॉकडाउन का भी कुछ किराया
माफ नहीं हो पाया था।
क्या खायेंगे, कैसे गुजारा कर पाएंगे
ऐसा हमसे मकान मालिक बोला था,
तो सुनो, कोटा वालों
हमनें क्या पैसों का पेड़ उगाया था।
कुछ दिन पहले ही तो
फीस भरी थी कोचिंग की
जिसको मैं उधारी में लाया था।
अब आप ही बताओ
कैसे चुकता कर पाऊँगा।
उम्मीदें थी जल्दी भर्ती आयेगी
क्या पता था सरकार का
कि ये वादें भूल जायेगी,
समोसे खा-खाकर
बिना निष्कर्ष बैठके हो जायेंगी।
हमारी बातों का
कोई संज्ञान नहीं लेता,
तुम्हारे लिए हम बिज़नेस है
तुमने पैसा कमा लिया
अब कोई ध्यान नहीं देता।
फिर भी हम हिम्मत कहाँ हारते
हम आयेंगे, फिर आयेंगे
अपने सपनों के लिए,
उन्हें पूरा करने के लिए
फिर से पूरे जोश से
नई ऊर्जा, उमंग के साथ
तैयारी में लग जायेंगे।
हाँ, हम फिर आयेंगे.....।।
13. प्रेम एक साधना
प्रेम का विषय अत्यंत कठिन हैं,
प्रेम को शब्दों में बयां करना
इतना आसान नहीं है।
प्रेम को ऐसे नहीं समझा जा सकता,
प्रेम की परिभाषा उकेरना असंभव हैं।
इसको केवल करके ही
समझा जा सकता है।
प्रेम एक साधना है,
और साधना में साधक को
त्याग करना पड़ता हैं।
प्रेम केवल सजीव से ही नहीं अपितु
यह तो किसी से भी हो सकता हैं।
चाहे वह निर्जीव हो,
चाहे अलौकिक हो।
प्रेम आत्मिक होता है,
प्रेम सात्विक होता है।
14. प्रेम- कविताएं
प्रेम में जितने प्रेम- पत्र नहीं लिखे गये,
उससे ज्यादा कविताएं लिखी गयी हैं।
प्रेम- पत्र को छुपा कर रखना पड़ता हैं,
या किसी ऐसी जगह रख दिया जाता हैं।
जहाँ तक कोई पहुँच नहीं पाये।
इससे अच्छा तो कविताएं लिखी जाये
जो हमेशा साथ रहती है डायरी में
या फिर किताबों में सजती सँवरती हैं।
मैंने भी लिखी है उस पर कविताएं
उसकी बनाई अदरक वाली चाय पर
उसके काजल लगे नयनों पर
उसकी पायल की आवाज पर
उसके झुमके पर उसके नखरों पर
हर बार एक कविता बनती हैं,
जब वह मिलती है या बिछुडती हैं।
प्रेम - पत्र कहाँ लिख पाया हूँ,
जब उसकी याद आती हैं कविता लिख देता हूँ।
हिज्र के बाद प्रेम-पत्रों को फाड़ दिया जाता हैं,
जला दिया जाता या नदी में बहा दिया जाता हैं।
जबकि की कविताओं को पढ़ा जाता हैं,
कविताओं में उसको जीया जाता हैं,
और उसके बाद भी कविताएं लिखी जाती हैं,
नये प्रेमियों द्वारा तमाम प्रेम कविताएं पढ़ी जाती हैं।।
15. प्रेम-पत्र
हम उस आधुनिक डिजिटल जमाने में जी रहे हैं,
जहाँ प्रेम में प्रेम - पत्र नहीं लिखे जाते हैं।
आजकल इतना वक्त कहाँ होता है,
कि पत्र लिखे फिर उसको उसको पोस्ट करें
फिर चार-पांँच दिन में पत्र उसके पास पहुँचेगा
और फिर उधर से जवाब आयेगा
तब तक आधा महीना हो चुका होता है।
अब प्रेमियों में इतना धैर्य कहाँ शेष रहा है,
डिजिटल जमाना है पत्र क्यों लिखेंगे?
चैट बॉक्स में चिपके रहते
व्हाट्सएप, इंस्टा, मैसेंजर
यहाँ तक कि वीडियो कॉल भी हो रहे हैं।
इसमें नाराजगी,खुशी को भी इमोजी से दिखाते हैं
और छोटी-छोटी बातों पर लड़ाई होती हैं।
और फिर ब्लॉक, यह कैसा प्रेम है ?
प्रेम में इंतजार का अलग ही मजा होता है,
जो लगभग खत्म- सा हो गया है।
इंतजार में प्रेम पर कविता लिखी जाती थी
और कविता में एक दूसरे को जीया जाता था।
16. प्रेम
जब किसी को
किसी से प्रेम हो जाता है
तो वह उसके लिए
कुछ भी करने को तत्पर रहता है।
चाहे दुनिया छोड़नी हो
या विष पीना हो।
जैसे मीरा ने कृष्ण से किया था,
कृष्ण ने राधा से किया था,
वो सात्विक प्रेम ....
प्रेम में जरूरी भी नहीं
कि तुम मिल पाओ,
लेकिन प्रेम सीधा आत्मा से जुड़ जाता है
जब प्रेम में पवित्रता, सात्विकता का
हनन हो जाता है,
तो वह प्रेम ,प्रेम नहीं रहता,
उसमें केवल चाह शेष रह जाती है,
जो कलुषित मानसिकता को जन्म देती है।।
और जो दुनिया में प्रेम को
कलंकित करने का काम करती हैं।।
17. मेरे कान्हा
(राधा कान्हा से कहती हैं)
तुम बाँसुरी बजा कर मुझे मना लेना
जब कभी मैं तुमसे रूठ जाऊंगी
तुम्हारी बाँसुरी सुने बिन रह ना पाती
तुम बाँसुरी बजा देना मैं मिलने आऊंगी
कालिंदी के तट पर जब तुम क्रीड़ा करते हो
मेरे प्रेमी पागल मन को प्रफुल्लित करते हो
मैं माखन लेकर आऊं तो मटकी मत फोड़ना
तुम्हें प्रेम करती हूँ पने हाथों से खिलाऊंगी
ओ ! मेरे कान्हा ह्रदय से लगा लो मुझको
मैं तुम्हारी हूँ तुम्हारी रूह में समा जाऊंगी
तुम ही मेरे सब कुछ हो हर पल तुम्हें ही याद करती हूँ
कभी छोड़कर मत जाना प्रिय बिछोह में मर जाऊंगी
18.. बंशी चूम गयी
(राधा कान्हा से कहती हैं)
तुम बार बार बंशी ना बजाया करो
तुम मुझको ऐसे ना तड़पाया करो
तुम माखन चोरी ना किया करो
तुम मेरा ही माखन खाया करो
ये तुम्हारा मोरपंख मुझको दे दो
मैं इसे देखकर रैनभर काट लूंगी
तुम इतनी मधुर बंशी बजाते हो
तुम सभी गोपीयों को नचाते हो
कान्हा मुझे सिखाओ बंशी बजाना
मैं भी मधुर बांसुरी बजाऊँगी
कान्हा की बंशी राधा ने अधर पर रखी
बंशी तो ना बजी राधा खुद झूम गयी
बंशी सीखने का बहाना करके राधा
कान्हा के लबों पे रहने वाली बंशी चूम गयी
9. माँ
दुनिया में सबसे ज्यादा प्यार
केवल माँ ही कर सकती हैं।
माँ के प्यार की तुलना
किसी से भी नहीं जा सकती,
तुम्हारा रंग ,रूप कैसा भी हो
लेकिन माँ का प्यार कभी
किसी से कम नहीं होता हैं|
माँ जीवन की पहली शिक्षक
और संस्कारदायनी होती हैं,
माँ केवल एक शब्द नहीं हैं,
माँ साक्षात् ईश्वरीय शक्ति हैं।
माँ है तो पूरी दुनिया हैं
माँ के कदमों में जन्नत हैं।
20. “ पिता"
पिता केवल एक
छोटा सा शब्द मात्र नहीं है।
पिता वो ईश्वरीय शक्ति हैं,
जिसके सानिध्य में
हम जीवन जीना सीखते हैं।
पिता उस वृक्ष के समान है
जिसकी छांव में
कई पौधे जीवित रहते हैं
और उसके सहारे बढ़ते हैं।
कई पंछी उसके भरोसे रहते हैं,
उसी को अपनी दुनिया मानते हैं।
पिता हमको कंगुरा बनाने के लिए
नींव के पत्थर बन दब जाते हैं
अपना सब कुछ न्योछावर कर देते हैं
संघर्ष और साहस के प्रतीक है पिता
हिमालय के समान अटल हैं पिता..।।
21. “बेकसूर बेटियाँ मारी गयी"
कब तक मोमबत्तियाँ जलाओगे ?
स्टेटस लगा लगाकर न्याय मांगोगे,
यह सब तुम कितने दिन कर पाओगे
बस कुछ ही दिन में भूल जाओगे
फिर कुछ नेता आगे आएंगे
राजनीति की रोटियाँ सेकते नजर आएंगे।
एक था रावण जिसने सीता-हरण किया था
बदले में उसको मौत मिली थी
लेकिन फिर भी हर वर्ष जलाया जाता हैं।
और यहाँ कितने ही दुष्टों ने कांड किये हैं,
फिर उनको क्यों नहीं जलाया जाता हैं?
तुमने कितनी बेटियों की दुर्दशा सही हैं,
रोकर तुम्हारी अश्रुधारा भी खूब बही हैं।
फिर क्यों न तुमने सरकारों से बात कही हैं?
दिल्ली,हाथरस या बल्लभगढ़ हरियाणा हो
हर जगह हर बार बेकसूर बेटियाँ मारी गयी हैं।
क्या कुछ भी दिखाई नहीं देता अंधी सरकारों को
छपने से पहले ही बेच दिया जाता अखबारों को
जब भी बेटियों का आँचल शर्मसार होता हैं,
देखना माँ-बेटियों का दामन कितना रोता है।
अब भी तुम्हारा खून ना खोले तो तुमको धिक्कार
एक कानून नया लाया जाये सुन लो ओ! सरकार
अपराधी के पहले अंग- अंग काटकर तड़पाया जाए,
फिर बीच चौराहे पर फाँसी के फंदे से लटकाया जाए।।
22. परिवर्तन अब हो
तुमने कभी मुझको रुलाया हैं,कभी मुझको जलाया हैं,
मांग दहेज की खत्म ना हुई, बापू का घर बिकवाया हैं।
किताबों वाले इन हाथों से नरेगा में काम करवाया हैं,
चाल चली तुमने ऐसी-वैसी,नाम बदनाम करवाया हैं।
घर के बिगड़े जितने काम सबका मुझपे इल्जाम आया हैं,
मैंने पावन रिश्ते निभाये, फिर भी तुमने कलंक लगाया हैं।
बन्द अँधेरे कमरों में घुट - घुटकर मरकर जिंदा हूँ,
तुम्हारी दुष्टता वाली इन हरकतों से बहुत शर्मिंदा हूँ।
मैं नारी हूँ सब कष्ट सहकर सारी वेदनाएं पी जाती हूँ,
कोई तू न कहे मेरे बापू को,सब झेल कर जी जाती हूँ।
आदि काल से मुझ पर न जाने कितने व्यभिचार हुए,
अब तक आधुनिक पुरुषों के,ना परिवर्तन विचार हुए।
जब इन घोर अंधेरी रातों में ताबूत उठाए जाते हैं,
जितने भी होते वो सब के सब सबूत मिटाए जाते हैं।
हाँ, मैं नारी हूँ ,मुझमें देवत्व हैं,मुझसे ही तुम सब हो,
खूब हुआ ये दर्दों का सहना-वहना परिवर्तन अब हो।।
23. “घर से दूर"
अपने घर से दूर रहना
कोई नहीं चाहता हैं।
लेकिन कुछ मजबूरियाँ होती हैं,
इसलिए घर से दूरियाँ होती हैं।
सपनों के लिए रहना पड़ता हैं,
अपनों के लिए रहना पड़ता हैं।
पढ़ने के लिए रहना पड़ता हैं,
कमाने के लिए रहना पड़ता हैं।
वो दिन-रात एक करता हैं,
अपनी किस्मत से लड़ता हैं।
उसको याद बहुत आती हैं,
अपनों की , अपने घर की
कभी-कभी तो रो भी देता हैं।
अपने घर से दूर रहना
कोई नहीं चाहता हैं।।
24. “खेतों की महक"
मेरे गाँव के खेतों में
महकते हुए सरसों के
सुनहरे पीले- पीले फूल
और चारों तरफ
लहलहाती हुई हरी फसलें
खेतों से आती हुई खुशबू
मन प्रसन्न कर देती हैं
पहली बारिश में
मिट्टी की सोंधी-सोंधी खुशबू
हमें मिट्टी से जुड़े होने का
अहसास कराती हैं।
और खेतों से आती हैं
मेहनत की खुशबू
आत्मसंतुष्टि की खुशबू
जिसे एक किसान
बखूबी महसूस करता है।।
25. महाराणा प्रताप
आगे बढ़ता लिए मुँह में तलवार,
शहीद हो गया सह कर वार,
हमला करता उठा पैर घातक,
महाराणा का वीर अश्व चेतक ।
ना पकड़ सकी महाराणा को मुगल तलवार ,
युद्ध किया मेवाड़ी सेना ने जंगल से छापामार ,
हल्दीघाटी में आई थी मुगलों की भरमार ,
भाग गए सारे के सारे जब चली मेवाड़ी तलवार।
महाराणा प्रताप नीला घोड़ा रा असवार ,
आजीवन करते रहे मातृभूमि से प्यार अपार,
स्वाभिमान की प्रतिज्ञा करके राजमहल छोड़ा ,
और मेवाड़ के खातिर राजगद्दी से मुँह मोड़ा।
राव चंद्रसेन के कदमों पर चलने वाला ,
बांध कमर तलवार लिए हाथ में वजनी भाला ,
अकबर ने भेजा था मानसिंह राजपूताने वाला ,
मुगलों में था नहीं महाराणा के सामने आने वाला।
हे महाराणा प्रताप जयवंता का जाया ,
आपने मान पूरे हिंदुस्तान का बढ़ाया ,
मुगलों के उन नामर्दी गुर्गों को ,
काट भेंट रणचंडी के चढ़ाया ।।
छोड़ स्वर्ण पात्र पत्तों में भोजन खाया ,
भगवा के दुश्मन मुगलों को मेवाड़ से भगाया ,
स्वामिभक्त चेतक ने मर्दाना पर पैर जोर से जमाया ,
महाराणा प्रताप ने मानसिंह पर भाला जोर से चलाया।
दुश्मन के हाथी के लगता छूट जाता रक्त का फव्वारा,
जो सेवा करता मुगलों की हो जाता रणचंडी का प्यारा,
आजीवन संघर्ष किया हल्दीघाटी का शेर कहलाया,
चित्तौड़,मांडल छोड़ पूरे मेवाड़ पर अधिकार जमाया।।
26. “बचपन"
वो हँसता हुआ बचपन
और वो बचपन की दोस्ती ,
कभी एक पल की
सिकन नहीं होती थी चेहरे पर!
हमेशा मुस्कुराहट
आँखों मे उदयमान
आशा की चमक,
हमेशा मिलकर रहना
और मिल बांटकर खाना,
छोटी-छोटी मिठ्ठी गोलियों के
चार टुकड़े करके खाते थे,
छोटी-छोटी बातों पर
लड़ते भी थे,
मिट्टी मे खेलते-खेलते
पता नहीं कब?
एक हो जाते थे!
कोई फ़िर से लौटा दे
वो बचपन वो खुशियाँ
वो दोस्ती वो मुस्कुराहट! ! ! !
27. “बचपन की यादें''
इमलियों सी खट्टी-मीठी
बचपन की यादें,
दादा-दादी की कहानियाँ
नाना-नानी की बातें,
जुगनुओं का प्रकाश और
टिमटिमाते तारों वाली रातें,
रंग-बिरंगी उड़ती हुई तितलियाँ
और तालाब वाली मछलियाँ,
गाँव के पगडण्डी वाले रास्ते
कल-कल करते झरने
और सावन के झूले,
सुंगन्ध बिखेरते
सरसों के फूल पीले,
बचपन की ये यादें हैं
जो मेरे गाँव में बसती हैं
जो मेरे दिल में बसती हैं।।
28. “बचपन के दिन"
ना माथे पर शिकन होती थी,
ना कोई किसी बात का अफसोस था।
हर लम्हें को खुशी से जीते थे,
रेत के घरौंदे बनाया करते थे,
और गुड्डे गुड़ियों वाले खेल खेला करते थे,
तितलियों संग दौड़ लगाया करते थे,
वह बचपन के दिन बहुत याद आते हैं।
अब बड़े हुए तो मजबूर हुए,
सपनों के खातिर घर से दूर हुए,
लौटकर बचपन तो आ नहीं सकता,
लेकिन जिनका बचपन हैं उनको जीने दो,
उनको उनकी मर्जी का करने दो....।।
29. “बचपन वाले खेल”
हम जो गुड्डे - गुड़ियों वाला
खेल खेलते थे
सारे रिश्ते -नाते
निभाते थे,
गुड़ियों की सगाई
फिर उनकी शादी वाली धूम,
गीत,नृत्य,सजावट
सब होता था,
बारात आना
फेरे करवाना
और दुल्हन को
विदा करने वाला दृश्य
सब के सब याद है मुझे
दुल्हन का रूठना
पीहर को आना,
फिर उसे मनाना।
सारा खेल अब भी
वैसा का वैसा ही याद है,
बहुत याद आता है बचपन।।
30. “मैं बदल जाऊँगा"
बिल्कुल सही कहा आपने
मैं बदल जाऊँगा,
हाँ, बदलना पड़ता है
वक्त के साथ ,
चाहे वह वस्तु हो या आदमी
उसमें वक्त के साथ
आवश्यकतानुसार बदलाव जरूरी है ।
वरना उसका औचित्य खत्म हो जाता है
जैसे एंबेसडर कार हो या नोकिया फोन,
यह दोनों अपने वक्त में
कितने परफेक्ट थे,
लेकिन वक्त के साथ
बदलने की जरूरत थी ।
समय की मांग थी परिवर्तन
और उनमें नवीनीकरण की ,
और उसका खामियाजा
उनको भुगतना पड़ा ।
मुझे भी बदलना पड़ेगा
अपने-आप के लिए
अपने-आप की गलतियों को
सुधारना पड़ेगा
खुद में नवीनीकरण के लिए
बदलना पड़ेगा,
खुद को इंप्रूवमेंट करना है
इसलिए बदलना पड़ेगा,
मुझे नया सीखना है
इसलिए बदलना पड़ेगा,
हाँ, मुझे बदलना पड़ेगा
वक्त के साथ चलना पड़ेगा,
बीना बदले तो
पानी भी सड़ जाता जाता है
उसे भी बदलना पड़ता है।
मैं भी बदल जाऊँगा,
मुझे बदलना पड़ेगा ।
हाँ,बिल्कुल सही कहा आपने
मैं बदल जाऊँगा ।।।।
31. "डायरी लिखता हूँ"
मैं नहीं जानता हूँ कि क्या लिखता हूँ ?
हाँ, मगर मैं डायरी लिखता हूँ।
मैं नहीं जानता हूँ कि
गीत क्या होता, ग़ज़ल क्या होती हैं ?
हाँ, मगर मैं डायरी लिखता हूँ ।
अनजान हूँ अभी मैं साहित्य से
मैं नहीं जानता हूँ कि कविता क्या होती हैं
छंद क्या होते हैं,शायरी क्या होती है ?
हाँ, मगर मैं डायरी लिखता हूँ ।
ज्ञान नहीं हैं मुझको लिखने का
कोशिश करता हूँ टूटे-फूटे बिखरे शब्दों को
जोड़कर माला बनाने की
मैं नहीं जानता हूँ कि क्या लिखता हूँ ?
हाँ, मगर मैं डायरी लिखता हूँ ।।
32. कविता
रहती है शब्दों में, पक्षियों के कलरव में
उड़ती है छोटी-छोटी चिड़ियों की तरह,
दूर- दूर तक चली जाती हैं दुनिया में
शब्दों में ढ़लकर , मधुर ध्वनि बनकर
रुकती नहीं हैं किसी एक स्थान पर
चलती ही जाती हैं निरन्तर ।।
सूरज की किरण में, चांद की चाँदनी में
सर्दियों की गुनगुनी धूप में,
फूलों की खुशबू में रहती हैं कविता ।।
किसान की लहलहाती फसलों के
इर्द-गिर्द घूमती हैं कविता,
सावन के फुहारों में टपकती हैं,
एक-एक बूंद में होती हैं कविता ।।
मधुर गीत सुनाते झरनों से जन्म लेती हैं,
खेत खलिहान , घर आंगन
और मकान सब में घूमती हैं कविता,
रुकना नहीं उसका काम,निरंतर चलती हैं।।
33. “आओ-ना फिर से तुम" भाग 1
आओ -ना फिर से तुम
मंदिर के पीछे वाले बगीचे में,
बहुत दिन हो गये हैं
बात किये तुमसे,
मैं इंतजार करता हूँ तुम्हारा
वहीं पर जहाँ तुम मिले थे मुझे
वो छोटे - छोटे पौधे
अब बड़े हो गये हैं।
तुमको बहुत याद करते हैं
और वो तुम्हारी
प्यारी -प्यारी चिड़ियाँ
रोज आती है तुमसे मिलने
जिनके लिए तुमने परिंडे बाँधे थे!
आओ-ना फिर से तुम
मैं भी बहुत याद करता हूँ तुमको
तुम बहुत दिनों से
आये नहीं हो,
कहाँ गुम हो रहे हो. . . .! !
34. “ आओ-ना फिर से तुम" भाग 2
याद है ना तुम्हें
जब हम स्कूल के ग्राउंड में
सतोलिया खेलते थे
और शाम को गली में
आँख मिचौली खेलना
कितना अच्छा लगता था।
हम सब साथ-साथ रहते थे।
अब क्यों ? दूर चले गए हो तुम
आओ-ना फिर से तुम
आज भी मैं
इंतजार करता हूँ तुम्हारा..
चाँदनी रात में
कबड्डी खेलना
और जब किसी के
हाथ,पैर में चोट लग जाती थी,
तब उस पर जादुई फूँक मारना
और थोड़ी सी बारिक मिट्टी डालना..
ये किसी दवा से
बिल्कुल कम नहीं था..!!
35. “आओ-ना फिर से तुम" भाग 3
तुमको बर्फ गोले वाली
आइसक्रीम बहुत पसंद थी ना,
अलग अलग रंगों में सजी हुई।
ऊपर से नींबू का रस
और सड़क के किनारे
खड़े रहकर खाना।
मैं जब भी उस बर्फ गोले वाले की
आवाज सुनता हूँ
तो तुम्हारी याद आ जाती है।
आओ -ना फिर से तुम
वही सड़क के किनारे
बर्फ के गोले खाएंगे
नीबू के रस की तरह
खट्टी- मीठी यादें
अक्सर रुला देती हैं।
आओ -ना फिर से तुम
आज भी मैं
इंतजार करता हूँ तुम्हारा..!!
36. “आओ-ना फिर से तुम" भाग 4
आओ-ना फिर से तुम
मैं इंतजार कर रहा हूँ ,
तुम्हारा..
अब सबके पेपर
खत्म होने वाले हैं!
आओ -ना फिर से तुम
गाँव की
सूनी पड़ी गलियों में
फिर से चहल-पहल करते हैं!
छोटी-छोटी बातों को
अब भुलाकर
फिर से गले मिलते हैं,
आओ-ना फिर से तुम
मिल कर सब शोर करते हैं
कितने दिनों से दूर रहते हैं,
आओ हम सब मिलकर
छुट्टियाँ बिताते हैं,
दिखा दो सबको यारों
हम सब दिल मिलाते हैं!!
37. “आओ-ना फिर से तुम'' भाग 5
वो सावन के हल्के -हल्के
फुहारों मे भीगना,
धूल के गुब्बारों के
पीछे -पीछे दौड़ना,
फूलों पर मंडराती हुई
रंग -बिरंगी
तितलियों को निहारना,
पहली बारिश में
मिट्टी का महकना
और अपनी सोंधी-2 खुशबू
हवा के हवाले करना।
ये सब यादों की
अंजुलि में भरकर
ख्वाबों में बसा लेता हूँ।
आओ - ना फिर से तुम
आज भी मैं तुम्हारा
इंतजार करता हूँ।।
38. “आओ- ना फिर से तुम” भाग 6
आओ-ना फिर से तुम
वहीं पर जहाँ हम
सावन में झूला करते थे,
सबसे तेज झूला झूलना
और फिर
अपने प्रेमी -प्रेमिका
का नाम पूछने पर
शरमाना,
नाम नहीं बताने पर
चलते झूले में ही
पतले डंडे से मारना।
कितना मजा आता था,
सावन तो
अब भी आता है,
पर बेचारा बूढ़ा
पीपल का पेड़
अकेला खड़ा रहता है।।
अब उस पर
झूले नहीं बांधते हैं,कोई भी
पूरा सावन वह
इंतजार करता है,
उन सुनहरे लम्हों का
जिनको उसने
जीवन में देखा है।।
अब कोई वहाँ
कब आते हैं ?
सावन के झूले
खाली रहते हैं,
तुम्हारे बिन,
आओ -ना फिर से तुम
सावन में फिर से
खुशियों के रंग भरते हैं.।।
39. लौट आओ तुम
कैसे हो तुम? कहाँ हो तुम?
कुछ पता नहीं
किस हाल में हो तुम?
तुमको याद भी
नहीं आती है ना हमारी
आओ -ना फिर से तुम
चलते हैं फिर से खेतों की ओर
हरे - हरे कच्चे आम
और वह खट्टी-मीठी ईमलियाँ,
बस सब यादें बनकर रह गई है!
आओ- ना फिर से तुम
उन पुरानी यादों में
गोते लगाते हैं!
आज भी मैं
इंतजार करता हूँ तुम्हारा
आम के पेड़ की छाँव में,
लौट भी आओ तुम
फिर से अपने गाँव में. . ।।
40. मासूम मन
कहाँ चले गए हो तुम?
बिना बताये ही
तुम्हारे बिन मासूम मन
नहीं लगता है,
मैं तुम्हारा इंतजार करता हूँ!
कभी तो आओगे तुम
उम्मीदों में हमेशा ऑन रहता हूँ!
पार्क में नहीं आ पा रहे हो
तो मैसेंजर पर तो आओ
कब से एक्टिव वाले
हरे बिंदु का इंतजार कर रहा हूँ।
आओ -ना फिर से तुम
गुस्सा क्यों करते हो
बात तो बताओ यार
तुम्हें हुआ क्या है??
41. सावन आया
सावन आया है,
मौसम सुहाना आया हैं।
रिमझिम फुहारे शुरू हुई हैं,
आओ तुम भी निकलो घर से,
चलो,घूमने चलते हैं,
दूर शहर से चलकर
थोडी मौज मस्ती करते हैं।
आओ गर्म पकौड़े खाते हैं,
शहर के बाहर वाली थड़ी पर
गरमा गरम चाय पीते हैं,
क्यों घुट घुट बंद रहते हो
अपने ही मकां में
आओ बाहर तो निकलो जहाँ में,
आओ-ना फिर से तुम
बारिश की बूंदों में भीगते है,
आओ,चलो घूमने चलते हैं।।।
42. तुम्हें याद करता हूँ
अब तक सहेज कर रखा है,
तुम्हारी हर बात को यादों में,
तुम्हारा खत आज भी रखा है,
मेरी डायरी में!
तुम कितनी भोली थी
अब चंचल हो गई हो,
बहुत याद आती है तुम्हारी. . .
तू रुठती भी थी मुझसे
और मैं मनाता भी था,
फिर से रुठो,मैं फिर से मनाऊंगा,
हर लम्हे,किस्से को सहेज रखा है,
बहुत याद आती है तेरी,
आँखें नम हो जाती है
जब भी याद करता हूँ ,
तुम्हें और तुम्हारी
नटखट हरकतों को. ।।
43. खेत पर
हमारे खेत की मेड पर
जो हम शहतुत खाया करते थे,
कितने रसीले होते थे ना शहतूत।
जब भी मौका मिलता था
अक्सर खेत पर निकल जाते थे,
फसलों के नजारे मन भावन होते थे,
बचपन की वो सब यादें,
बस अब यादें ही रह गयी है।
तुम लौट आओ -ना फिर से
हम वही खेतों में पीले रंग की
चुनर ओढ़े प्रकृति के बीच
फिर से बचपन में खो जायेंगे....
तुम्हें पीला रंग बहुत पसंद था,
तुम पीले रंग के कपड़े पहने
सरसों के फूलों में गुम हो जाती थी
और मैं तुमको आवाज़ लगाता था ,
सुनो -ना मेरी आवाज...!!
44. अमलतास के फूल
स्वर्ण आभूषणों की तरह
चमकते हुए
अमलतास के पीले -पीले
फूलों के गुच्छे
तुम्हारे लिए तोड़ कर लाता था,
तब तुम फूलों की तरह महक जाती थी।
अब भी मैं अमलतास के
फूल लाता हूँ तुम्हारे लिए,
तुम वापस लौट आओ,
मुझसे वो अमलतास
अब भी पूछता है,
कि किसके लिए ले जाते हो तुम
सुनहरे फूलों को।
मैं हमेशा ही मुस्कुराकर
तुम्हारा नाम बता देता हूँ।
फिर मन ही मन सोचता हूँ
कि तुमको लेकर चलूँ एक दिन वहीं पर
इतने में आँखें भर आती है,
याद कर तुम्हें ....!!
45. चाय पिला देते हैं
मेरे दोस्त मुझको याद
चाय की दिला देते हैं,
भीषण गर्मी में भी
दो गिलास पिला देते हैं।
चाय के बिना तो हमारी
मुलाकात अधूरी रहती हैं,
कॉलेज वाली बात न करें
तो बात अधूरी रहती हैं।
तेरी वाली ,मेरी वाली
सबके हाल पूछे जाते हैं,
जिनके नहीं है चुप रहते
सोना बाबू वाले इतराते है।
जिसके नई बनी हो फ़्रेंड
उसको खूब चढ़ाते हैं,
आज की पार्टी तेरी तरफ से
कहकर सारा बिल भरवाते हैं।
46. कह दो
वो जो बातें हैं न दिल में
जिनको तुम किसी से कहना चाहते हो।
कह दो,कब तक थाम कर कर रखोगे ।
अंदर ही अंदर कचोटती हैं तुमको
उन बातों को दबाए रखना
खुद को सजा देना जैसा ही हैं।
जो भी होना है हो जाएगा
कह दो , जिससे भी कहना हैं।
जीवन एक कहानी की तरह
और तुम उसके पात्र हो।
जो तुम्हारे हिस्से में हैं
वह तुम्हारे साथ होना हैं।
कह दो यार, बस यही तो होना हैं,
या तो 'हाँ' होगी या 'ना' होना हैं।
कहने से क्यों डरते हो?
खुद से भी तो बातें करते हो ।
चलो आज कह ही दो,जो होगा वह होने दो।।
47. कहाँ गयी हो'
कहाँ चली गई हो
बिना बताये ही
क्या नाराज हो तुम मुझसे
ऐसे क्यों तड़पा रही हो
क्यों रुला रही हो मुझे
तुमको हर जगह ढूंढ़ा है मैंने
कॉलेज के बाहर
कोचिंग के बाहर
रुककर बहुत इंतजार किया है।
मेरी नजर ने
इन चौड़ी चौड़ी सड़को पर
नजर दौड़ाकर
खूब ढूंढ़ा है तुझको
मेरे साथ ही तुमने
क्या शहर भी छोड़ दिया है।
इतने ही दिनों में
तेरा मन भर गया,
या कोई और तेरे दिल मे बस गया।।
48. गुड नाईट कहे बगैर
तुमसे गुड नाईट कहे बगैर ,
मैं अकेला सोना नहीं चाहता ।
जब तक तुम ऑन हो सनम,
मैं ऑफ होना नहीं चाहता ।
तुम जिंदगीभर ऐसे ही साथ रहो,
मैं तुम्हें कभी खोना नहीं चाहता ।
अब की तरह हमेशा खुश रहूँ ,
मैं तुम्हारे बिन रोना नहीं चाहता ।
महोब्बत तेरी मेरी अमर हो जाये,
तेरी जुदाई मे मरना नहीं चाहता ।
मैने महोब्बत सीखी है सभी से,
मैं कभी नफ़रत करना नहीं चाहता ।
इश्क़ के खातिर लोगों मे बैर पड़े हैं,
मैं किसी से बैर लेना नहीं चाहता ।
49 “गुलाब"
मुझसे ज्यादा
वो गुलाब रोया हैं,
जो तुमको देने के लिए
मैं लेकर आया था।
मेरी ही तरह
उसकी भी कुछ आरजू्ं थी
तुम्हारे मलमल से मुलायम
हाथों के स्पर्श की,
जो काँटो के मध्य वाले
जीवन को त्यागकर,
आपके कोमल हाथों में
अपना सर्वस्व समर्पित
करना चाहता था।
उसकी ख़ुशबू से
वो आपका जीवन
महकाना चाहता था।
और इन्हीं ख्वाहिशों में
उसने दम तोड़ दिया।।
50. “कॉलेज के केंटीन में"
कॉलेज के कैंटीन में
जब हुई पहली मुलाकात ,
हँस -हँस के बिताया दिन
यूं रो - रो के गुजारी रात ।
सपनों के संसार में
हम खोए हैं दिन रात,
उस छोरी के चक्कर में
बदल गए हालात ।
मैं तो उसके दिल का मारा
वह कर गई मुझसे घात ,
उस छोरी के चक्कर में
बदल गए हालात ।
हँस -हँस के बिताया दिन
यूं रो - रो के गुजारी रात।।
51. “शरमाते भी हो"
मुझसे तुम छुप - छुपकर कुछ गुनगुनाते हो,
किताब में रखा गुलाब का फूल तुम उठाते भी हो,
बहुत प्यार से देखकर सीने से तुम लगाते भी हो,
अचानक आ जाता कोई तो उनसे छुपाते भी हो..!!
नजर बचाकर नज़र मिलाते भी हो,
नज़र मिलते ही हमसे शरमाते भी हो,
धड़क उठता दिल तुम्हारा तुम घबराते भी हो,
नजरों को उठाकर बार - बार झुकाते भी हो...!!
कहना तो चाहते लफ़्ज सहेली से कहलवाते भी हो,
शायरियों की डायरी को पल्लू में छुपाते भी हो,
लफ्ज निकलते नही मुँह से घबराते भी हों,
देख - देख दूर से मुझे तुम बहुत इतराते भी हो..!!
52. “कॉलेज वाले दिन"
बहुत याद आते हैं
वो कॉलेज वाले दिन
कॉलेज के बाहर वाली थड़ी पर
भरी गर्मी में भी चाय पीना ।
यूनिफॉर्म पहनकर नहीं जाना
मैडम की डांट खाना और T.L.M. चुराना
फिर नाम बदल का जमा कराना ।
बहुत याद आते हैं वो कॉलेज वाले दिन
क्लास बंक करके झाड़ियों के बेर खाना
ऑटो का इंतजार करना, बारिश में भीग जाना
बहुत याद आते हैं वो कॉलेज वाले दिन ।।
53. हाँ ,मैं बदल गया हूँ
तुम बिल्कुल सच कह रहे हो कि मैं बदल गया हूँ।
पर हाँ,तुम तो नहीं बदले हो ना,
फिर तुम तो कॉल किया करो,
तुम तो बात किया करो,
पहले तुम मुझसे रात भर चैट करते थे।
अब क्या हुआ? मेरा कितना खयाल रखते थे
और अब कभी मेरा हालचाल तक नहीं पूछते
कितने मैसेज करता हूँ मैं तुमको
और तुम जवाब तक नहीं देते हो..
हाँ , मैं बदल गया हूँ ! !
पर तुम तो नहीं बदले ना फिर क्यों नंबर बदल लिया,
तुम्हे बिना बात किये एक दिन भी नहीं गुजरता था
और अब पता भी है तुम्हें,तुमने कब बात की थी?
क्या गुनाह कर दिया मैंने? तुमसे दोस्ती करके,
बताओ भी अब. .तुम बात क्यों नहीं करते हो?
54. कभी सोचना
कभी सोचना फुर्सत में बैठकर
मेरे बारे में, हाँ मेरे बारे में ही,
तुमने तो फैसला ले लिया
मुझसे दूर रहने का ,
लेकिन एक बार सोचना जरूर कि
क्या मैंने तेरे साथ कभी गलत किया?
हर वक्त मैंने तेरा साथ दिया
चाहे तुम कैसी ही समस्या में हो,
हर वक्त तेरे साथ खड़ा रहा।
हाँ,मानता हूँ जिंदगी तुम्हारी हैं
फैसले भी तुम्हारे ही होने चाहिए ,
लेकिन मेरी तो जिंदगी भी तुम हो
और मैं तुम्हें हमेशा खुश देखना चाहता हूँ ।
कभी सोचना फुर्सत में बैठकर में बैठकर
हमने कितना वक्त साथ में बिताया है,
चाहे मैंने अपने अंदर कई बातों को कुचल डाला
लेकिन कभी तुम्हारी खुशी कम ना होने दी दी।
कभी तुम्हारी आँखे नम ना होने दी।
कभी सोचना फुर्सत में बैठकर
क्या तुम मेरे बिन खुश रह पाओगे?
क्या खुलकर जिंदगी जी पाओगे?
55. फिर से आओगे
कुछ दिन बाद तुम्हारा
उससे भी मन भर जाएगा ।
देखना तुम्हें मैं ही याद आऊंगा
हाँ, उसके पास महंगी गाड़ी हैं,
उसके पास पैसा है वह अमीर हैं।
ऊंचे ऊंचे शौक है उसके शौक है उसके
तुम भी तो उसका शौक मात्र ही हो
तुमसे कौन सा प्यार करता है।
बड़ी-बड़ी होटलों के डिनर से
वो ओयो तक की बोलेगा,
तुम्हारे प्यार को पैसों से तोलेगा ।
फिर रोते हुए खुद को कोसते रहना
मेरे साथ जो वक्त बिताया था,
वह सोचते रहना,तुम रोते रहना।
फिर देखना कौन तुम्हारे आँसू पोछता हैं।
कौन तुम्हें कंधे का सहारा देता हैं।
तेरे आँसू उसकी आँखों से बहते हैं क्या?
इतने सब में तो तुम,
सारी हकीकत तुम जाओगे।
फिर से चलकर तुम,
जहाँ से गये थे वहीं आओगे।
56. “एक तितली"
एक तितली करीब से
दिल को छूकर गयी,
वादा किया था मिलने का
वो फ़िर मुकर गयी,
कोई बात नहीं
एक दिन फ़िर से
मेरे इश्क़ की महक
उस तक जायेगी,
फ़िर से वो लौटकर आयेगी. .
उसके बिन बेचैन सा रहता हूँ
ख्वाबों, खयालों में खोता हूँ
प्रेम सच्चा करता हूँ
और एक दिन
यहीं सच्चे प्रेम की महक
खिंच लायेगी उसे मुझ तक ।।
57. “महोब्बत करता हूँ''
महोब्बत करता हूँ,
महोब्बत में मेरे खर्चे हजार होंगे
तेरे शहर में देखना,
मेरी महोब्बत के चर्चे हजार होंगे
तुमने फ़रेब करके मुझसे
मुझे कुछ तो सिखाया है
हम ऐसे ही धोखे खा - खाकर
एक दिन देखना होशियार होंगे
तुम मुझसे और मैं तुमसे
फ़िलहाल दूर तो गये लेकिन
तू जब भी चाहेगी गले लगना
तब हम बाहें फैलाकर तैयार होंगे
58. “काफी वक्त”
डियर क्रश
तुमसे मिले , बातें किये ,
साथ बैठकर
पुदीने वाली चाय पीये ,
काफी वक्त हो गया है!
जबसे तुमने कॉलेज छोड़ा
फिर वापस तुम कभी आये नहीं
तुम्हें गयें हुये
काफी वक्त हो गया है!
तुम्हारी आंखों में आंखें डालें
तुम्हें देख कर मुस्कुराए
तुम्हें महोब्बत के किस्से सुनाये
काफी वक्त हो गया है!
तुम्हारे ही गुड मॉर्निंग वाले
मैसेज से मेरी हर सुबह होती थी
और अब तुम्हारे मैसेंजर पर
हरा बिंदु देखें काफी वक्त हो गया है!
59. “तुम्हारे हिस्से की चाय"
तुम्हारे हिस्से की चाय
अब मैं ही पी लेता हूँ।
अब तुमसे न बात होती है,
ना चाय पर मुलाकात होती है।
पर हाँ,तुम्हारे हिस्से की चाय
तो अब भी बनती है।
यूं तन से तो तुम दूर हो सकते हो
लेकिन मन से दूर होना
इतना आसान थोड़े हैं।
प्रेम में कुछ अनबन हो सकती है
लेकिन दूर होना ही
तो केवल उसका हल नहीं है,
हिज्र में हश्र क्या होता है?
तुम कहाँ समझ पाए हो इसको
तुमको तो बस
गलतियाँ निकालना आता है।
चाय पर तुम तो नहीं होते हो मेरे साथ
लेकिन तुम्हारे हिस्से की चाय
आज भी टेबल पर होती है,
और तुम्हारे गुलाबी होठों से
छूने का इंतजार करती है।
हाँ, मुझे लगता है
कभी इंतजार खत्म होगा,
फिलहाल तो
तुम्हारे हिस्से की चाय
अब मैं ही पी लेता हूँ...।।
60. “सर्दी की गुनगुनी धूप''
सर्दी की गुनगुनी धूप में
तुम्हारा ठिठुरते हुए छत पर आना
और मैं तुमसे बातें करने
दो किताबें लेकर आ जाता था!
याद है ना तुम्हें
जब तुमने मेरी किताब में
छुपके से कागज का
एक टुकड़ा रख दिया था,
जिस पर सिर्फ मेरे नाम की
डिजाइन बनी हुई थी!
एक कप अदरक वाली
गरमा गरम चाय लेकर आना
और तेरा पूछना,चाय पिओगे?
और मैं कभी मौका नहीं छोड़ता,
हाँ में गर्दन हिला देता था!
तुम कप को मेरे होठों से
लगा देती थी और मैं
दो-तीन चुस्की लेता
इतने में ही तुम
कप लेकर चली जाती थी,
और फिर मुझे दिखा-दिखाकर
बाकी चाय पी लेती थी!
सुबह की गुनगुनी सुनहरी
धूप में तुम्हारे हाथ से बनी
अदरक वाली चाय
तुम्हारे हाथ से पीने का
अब भी दिल करता हैं ! !
61. “दिल में बसा लो"
आरजूँ-ऐ-दिल की हम तुम्हें क्या बताये
तुम ही तो हो जो रात-दिन हमें सताये
तुम्हारे ही देखते ख्वाब तुम्हें क्या बतायें
तुम ही तो हो जो रात-दिन हमें सतायें
यादों से भरी टोकरी हम कहाँ छुपायें
तुम ही तो हो जो हमारे ख्वाबों में आयें
तुम ही को तो चंबल सेर हम करायें
तुम ही तो हो जो इश्क- ऐ- गम रुलायें
तुम क्यों इश्क को फांसलों में फंसायें
तुम क्यों दूर जाकर यूँ हमको रुलायें
अब मुझे दिल में ही बसा लो "संगम"
तेरे शहर में बढ़ रहे मकानों के किराये
62. “आज उनसे मिलना हैं"
आज उनसे मिलना हैं
साथ बैठकर
खूब बातें करना हैं ।
जो छुपा रखा हैं दिल में
वो सब बताना हैं,
आज उनसे मिलना हैं ।
अदरक,तुलसी,पुदीने वाली
गरमागरम चाय भी पीलाना हैं,
शे'र,शायरी,चुटकलों
से भी हँसाना हैं ।।
हँसते वक्त जब उसकी
लटे गालों पर लहरायेगी,
सुन्दरता उसकी
परी-सी हो जायेगी।।
63. ये प्यार नहीं तो क्या है?
Dear Crush
तुम मेरे ऑन आने का इंतजार करते हो
और फिर देर रात तक चैट करते हो. .
ये प्यार नहीं तो क्या है?
तुम मेरे लिए मम्मी की डांट खाते हो
मुझसे बातों में तुम नाश्ता भूल जाते हो. .
ये प्यार नहीं तो क्या है?
जब तक गुड मॉर्निंग ना बोल दूं
तुम्हारी सुबह नहीं होती हैं,
बिना गुड नाईट के भी सोते नहीं हो. .
ये प्यार नहीं तो क्या हैं?
तुम मेरे लिए स्टेटस भी लगाते हो
तुम मेरे लिए गिफ्ट भी लाते हो. . .
ये प्यार नहीं तो क्या है?
जब कभी तुम रूठ जाते हो तो मैं मनाता हूँ
और जब मैं रूठ जाता हूँ तो तुम मनाते हो..
ये प्यार नहीं तो क्या है?
64. “इश्क़ वाली चाय"
सर्दी का ठंडा मौसम हो
और तुम्हारे हाथ से बनी
अदरक वाली चाय हो
फिर कौन नहीं चाहेगा पीना।
एग्जाम वाले दिनों में
तुम सुबह जल्दी ही
मेरे लिए चाय बनाकर
मुझको जागती थी
और मैं दो कप चाय पीता था।
जब तुम बनाती हो तो
स्वाद ही बदल जाता हैं,
क्या मिलाते हो तुम ऐसा?
तुम्हारे शहर में
ठंड बहुत होती हैं
और ऐसी ठंड में रात में पढ़ना हो
तो चाय के अलावा कौन साथ देता है।
तुम्हारे संग आदत बन गयी चाय पीने की...
काटकर देखोगे तो
मेरे खून में चाय निकलेगी,
सुबह, शाम और रात को
ये तो अनिवार्य हो ही गई ।
और जो तुम पिलाते हो
वो तो अलग हैं ही
और फिर तुम्हारे साथ तो
इश्क़ वाली चाय पीने का
मजा ही अलग होता हैं।
कभी - कभी तो तुम
आँखों में आँखें डालकर
कप ही बदल देते हो ।
तुम ये चालाकी भी
बड़े कमाल से करते हो ।।
65. कौन हो तुम?
कौन हो तुम?
क्यों इस तरह से
देखते हो मुझे,
इतनी सादगी
हल्की - सी मुस्कान
और आँखों में
उम्मीदों की चमक।
बार-बार मुझ पर ही
नजरें रूकती है तुम्हारी . . .
मेरे निकट आने की
कोशिश करते हो ,
कभी -कभी
अनजाने बनकर छूते भी हो;
कौन हो तुम?
ऐसा क्यों कर रहे हो?
कहीं तुम अपना बनाने की
कोशिश तो नहीं कर रहे हो;
खैर जो भी है सच कहूँ तो
तुम भी मुझे अच्छे लगने लगे हो. . . ! !
66.चंचल “नींद"
अब तुम आ भी जाओ
आज अकेला ही हूँ ,
घर पर कोई नहीं हैं,
कब से तेरा इंतजार कर रहा हूँ !
कितनी देर हो गयी हैं?
तु अभी तक नहीं आयीं ,
तु आयेगी जरूर
मुझे भरोसा हैं तुझ पर
अभी क्यों नहीं आ रही हो,
क्या दिक्कत आ गयी ?
तेरे बिना मन नहीं लगता हैं
तुम दिन मे मत आया करो
दिन मे जरुरी काम आ ही जाते हैं,
तुम भी परेशान होती होगी
मैं भी होता हूँ !
तुम तो रात मे ही आया करो,
रातभर तुम्हारे साथ रहना चाहता हूँ।।
तुम्हारे आगोश में खो जाना चाहता हूँ !
अब तुम आ भी जाओ
तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ !
मेरी प्यारी-सी नटखट,चंचल “नींद". .! !
67. "अपना मानता हूँ तुमको"
Dear crush
तुम मिले और मेरी जिंदगी में आ गये,
मैं तुम्हारे लिए ही स्टेटस लगाता हूँ ,
ताकि तुम मेरी फीलिंग को समझ सके,
तुम कई बार मेरे मैसेज को अनदेखा करते हो,
फिर भी मैं तुम्हें मैसेज करता हूँ!
तुम बिना गुड नाईट किये सो जाते हो,
फिर भी मैं गुड नाइट बोलता हूँ !
और सुबह जब तुम उठते हो
तो हमेशा मेरा गुड मॉर्निंग मिलता है,
फिर तुम इसका जवाब भी देते हो !
Dear crush
अब तो समझो -ना
क्या अब भी नादान हो ?
शायद तुम्हें तो तड़पा कर मजा आता होगा,
शायद तुम अनजान हो अभी
मैंने अपना बना लिया तुमको,
तुम इसे वन साइड लव मानो
या पागलपन समझो!
पर मैं सच कह रहा हूँ,
अपना मानता हूँ तुमको. . ! !
68."हाँ, तुम"
हाँ, तुम
बहुत याद आते हो,
कितने दिन हो गये
तुमको मिले हुए।
तुमको तो नहीं आती हैं न याद
तुम तो कॉल भी नहीं करते,
खैर छोड़ो ये सब
अब ये बताओ कि
कब आ रहे हो मिलने।
मुझे तुम्हारा इंतजार रहता हैं,
और हाँ, इस बार
क्या लेकर आओगे मेरे लिए।
तुम पराठे बना लाना
और अपने हाथ से खिलाना,
मैं तुम्हें इस बार
तुम्हारी मनपसंद जगह
KST और कोटा बैराज ले चलूंगा।
कबूतरों संग फ़ोटो क्लिक भी करना है।
अब जल्दी चले आओ तुम,
हाँ, तुम
बहुत याद आते हो ।।
69. "तुमसे एक बात कहनी है"
घंटे भर तक
ढेर सारी बातें
करने के बाद,
मेरी एक बात
जो रोज बाकी रह जाती है !
तुमसे रोज
नयी-नयी बातें करता हूँ,
लेकिन मेरी एक बात
जो हमेशा
दूसरी बातों में
दबकर बाकी रह जाती है !
रोज सोचता हूँ
कि आज तो कह ही दूंगा,
फिर तुम्हारी
चटपटी इधर-उधर की
बातों में खो जाता हूँ !
मुझे तुमसे
एक बात कहनी है,
जो रोज बाकी रह जाती है !
70."तुम नाराज हो जाती हो"
तुम छोटी-छोटी बातों पर
नाराज हो जाती हो।
बस,बहाना चाहिए तुम्हें तो
रूठने के लिए,
कितनी प्यारी लगती हो,
जब तुम कहती हो
कि 'मैं नाराज हूँ तुमसे"।
तुम गाल फुला लेती हो
और चेहरा अजीब-सा बनाती हो।
जब रूठता देखता हूँ,
छोटी-छोटी नन्ही-सी परियों को
तो तुम्हारी रूठने वाली बातें
मुझे याद आ जाती है।
मैं तुम्हें मनाता हूँ तो
तुम जल्दी ही मान भी जाती हो।
तुम छोटी-छोटी बातों पर
नाराज हो जाती हो।
71. "पुरानी ऐनक"
सहेजकर रखी है,
वह पुरानी ऐनक!
अब काम नहीं आती है,
नंबर जो बढ़ गए हैं !
उसमें बचपन की यादें
साफ -साफ नजर आती है !
पहन भी लेता हूँ
कभी-कभी,
जीवन की धुंधलाहट
दूर करने के लिए!
उस पुरानी ऐनक को
पहनकर ऐसा लगता है,
जैसे हम क्लास में
पास -पास बैठे हो,
तुम्हारी पसंद का फ्रेम
मैंने बिना देखे ही
हाँ कर दिया था !
वो पुरानी ऐनक
आज भी फिल्म की तरह
सब यादें ताजा कर देती है !
72. " आज उनसे बात हुई "
बहुत दिनों बाद उनसे बात हुई हैं !
मैं रोज सुबह गुड़ मोर्निंग
और रात को सोने से पहले
गुड़ नाईट का मैसेज करता हूँ !
वो देखते भी हैं या नहीं भी देखते
तो भी मैं हमेशा मैसेज करता हूँ ।
वैसे हर बार तो नहीं
लेकिन कभी-कभी तो
उनका जवाब आता हैं ,
ऐसा ही कुछ आज हुआ
आज मैसेज का तुरंत जवाब आया
और फ़िर हालचाल पूछते हुये
बातें आगे बढ गयी !
आज बहुत दिनों बाद उनसे बात हुई हैं ।।
73. "संगम से इंकार कर गया"
पहली नजर में नैनों से वार कर गया
मैं अभी संभला नहीं था वो प्यार कर गया !!
वो जो नजरें मिलाने से भी डरता था
वही इश्क में सारी हदें पार कर गया !!
गलतफहमियों का दौर ऐसा आया
वह इश्क के आँगन में दीवार कर गया !!
बचकर जमाने की नजरों से वह
छुपकर दूर से ही दीदार कर गया !!
ये जो दूर से ही चले जाना उसका
इश्क के बीमार को और बीमार कर गया !!
जिसके बिना अधूरी - सी है जिंदगी
वही शख्स "संगम" से इनकार कर गया !!
74. कोई कुछ भी कहे
कोई कुछ भी कहे कहने दीजिए
हम जैसे है वैसे ही रहने दीजिए
जमाने भर की बातों का क्या
हमें अपने काम करने दीजिए
सागर बनाकर खारा ना करो
मीठा झरना हूँ मुझे बहने दीजिए
तुम्हारी कब से सुन रहा हूँ
अब तो मुझे भी कहने दीजिए
ये आँसू खुशी के आँसू हैं
ये बहते हैं तो बहने दीजिए
इतने भर से ही रुकना नहीं
अभी तो आगे बढ़ने दीजिये
अभी हिम्मत हारा नहीं हूँ मैं
हौसला हैं मुझे लड़ने दीजिए
तुम्हारे कसमें वादे तुम रखो
तुमसे ना होगा तुम रहने दीजिये |
75. इश्क़ तुमसे हैं
इश्क तुमसे हैं ये दिखाना तो नहीं हैं
जमाने भर को ये बताना तो नहीं हैं !!
खामोश आँखों के राज तुम समझो
जग जाहिर कर जताना तो नहीं हैं
तुमने खुब सता लिया मुझको
अब मुझे और सताना तो नहीं हैं
नजरों मे डालकर नजरें रखो
नजरें हमसे चुराना तो नहीं हैं
यूं खफ़ा- खफ़ा से क्यो रहते हो
दिन हिज्र के दिखाना तो नहीं हैं
लाली लगाकर आये हो लबों पे
लबों से लब बचाना तो नहीं हैं
हिज्र के बाद क्या होगा वो देखेंगे
अभी से अश्क बहाना तो नहीं हैं
मेरे बाद मेरा रकीब आना तो हैं
अभी से उसका आना जाना तो नहीं हैं ! !
76. "तुम दूर क्यों जाते हो'
तुम दुर क्यों जाते हो
मुझे ऐसे क्यों तड़पाते हो. .
अब तो बारिश भी आ गयी
तुम क्यों नहीं आते हो. .
सावन के मस्त फुहारों मे
तुम क्यों आग लगाते हो..
घनघोर घटाये बनकर तुम
तड़पते तन पर छा जाते हो..
इंतजार बारिश का रहता था
क्या तुम अब नही नहाते हो..
उम्मीदें दफा होने लगी है
अब क्यों न नैन मिलाते हो..
इंद्रधनुष मन भावन लगता था
अब क्यों नही मुझे दिखाते हो..
कागज की कश्ती मेरे नाम की
अब क्यों नही बहाते हो..
तुम्हें क्या हो गया "संगम"
तुम क्यों नही बताते हो..
77. "ऑन चैट मिले"
जब भी देखूं उसको ऑन चेट मिले मुझको
हर बार उसका रिप्लाई लेट मिले मुझको
जिद पे आकर तेरे घर तक आ भी जाऊँ
हर बार ताले से बंद गेट मिले मुझको
डेट की डेट कब तक सेट करूँ
हर बार डेट पे डेट मिले मुझको
जानूं स्विटु बाबू सोना सब बोल लिया
इन सब का रिप्लाई हेट मिले मुझको
छुपके से मैने वाट्सएप भी देख लिया
हर बार उसकी क्लियर चेट मिले मुझको
जिसको भी मैने चाहा सेट करना
वो ही ऑलरेडी सेट मिले मुझको
78. " गले मिलेंगे हम "
सुनो अकेले मिलेंगे हम
तुमसे गले मिलेंगे हम
संग बैठकर बतियाएंगे
कुल्हड़ चाय पीयेंगे हम
इधर-उधर की बातों में
मतलब खो जायेंगे हम
तुम कहो तो पलभर में
सौ साल जी जायेंगे हम
दुनिया वाले कुछ भी कहे
सब को सह जायेंगे हम
प्यार से दे जहर भी तो
जहर भी पी जायेंगे हम
79. "धूप में बैठने लगा हूँ"
सालभर की यादें समेटने लगा हूँ,
दिसंबर की धूप में बैठने लगा हूँ।
सुबह सुबह वो भी आती छत पर,
धूप के बहाने उसे देखने लगा हूँ।
इतना जो सज सँवरकर आती हैं,
सचमें उसे ही अब चाहने लगा हूँ।
रातभर नींद नहीं आती मुझको,
उसकी ही यादों में रहने लगा हूँ।
आजकल तो हाल ये हुआ मेरा,
ख़्वाब ए इश्क़ में बहने लगा हूँ।
कभी तो मुकम्मल होगी ग़ज़ल,
उसी पर सब शे'र कहने लगा हूँ।
80. "नया सफ़र"
फ़िर से शुरु नया सफ़र कर रहा हूँ
इस तरह खत्म दिसंबर कर रहा हूँ
खूब हुई दोस्ती,इश्क,महोब्बत की बातें
सालभर की बातें रिमेंबर कर रहा हूँ
मेरे अपनों से मैं माफ़ी मांग रहा हूँ
इस तरह मुकम्मल दिसंबर कर रहा हूँ
सालभर की सब गलतियाँ सुधार कर
खुद को गुड बेस्ट से बेटर कर रहा हूँ
ख्वाबों खयालों मे हर वक्त याद किया हैं
अब तेरी नजरों मे लव लेटर कर रहा हूँ
इतनी सर्द रातें हैं पानी बर्फ़ हो गया
मैं बर्फ़ मे खुद को हीटर कर रहा हूँ
खुद ही खुद को इश्क पढ़ाकर 'संगम'
खुद को ही इश्क का टीचर कर रहा हूँ
81. "पागल लड़का"
तुमसे कुछ तो बोलता वो पागल लड़का
इसलिए साथ डोलता वो पागल लड़का
कोरोना में लॉकडाऊन जब से लगा है
खिड़की से झाँकता वो पागल लड़का
सबको जल्दी गुड़ नाइट बोलकर
खुद रातभर जागता वो पागल लड़का
कितने ही गम,मुश्किलें साथ चलती
सपनों के पीछे भागता वो पागल लड़का
जब भी मोबाईल की घण्टी बजती
झट से देखता वो पागल लड़का
बैठा-बैठा न जाने कहाँ खो जाता हैं
क्या-क्या सोचता वो पागल लड़का
सब सोचते चैटिंग पर ये बिजी रहता
ऑनलाईन पढ़ता वो पागल लड़का
82. "अच्छा नहीं लगता"
तेरे घर ये ताला अच्छा नहीं लगता
तेरा चले जाना अच्छा नहीं लगता
तुम छत पर कुछ देर रुका तो करो
आकर चले जाना अच्छा नहीं लगता
जो तुम रूठकर यूँ दूर बैठ जाते हो
तेरा मुँह फुलाना अच्छा नहीं लगता
जब मैं किसी दोस्त से बात करूं तो
तेरा आँख दिखाना अच्छा नहीं लगता
रजा क्या है दिल की बता दो 'संगम'
मुझसे छुपाना अच्छा नहीं लगता
83. "धीरे - धीरे"
हाथ मिलेंगे धीरे - धीरे
चाय पियेंगे धीरे - धीरे
जब वो कोचिंग जाएगी तो
साथ चलेंगे धीरे - धीरे
तुम उलझी हो गणित सरीखी
हम समझेंगे धीरे - धीरे
इश्क़ महोब्बत वाली बातें
हम सीखेंगे धीरे - धीरे
तुम ही पर सब शेर शायरी
ग़ज़ल लिखेंगे धीरे - धीरे
चोरी-चोरी छुपकर तुमको
हम देखेंगे धीरे - धीरे
शाम हुई हैं आ जाओ यारों
जाम पियेंगे धीरे - धीरे
सब कहते हैं बिगड़ गए हो
हम सुधरेंगे धीरे – धीरे
84. "उसके शहर की"
कुछ तो ख़ास बात है उसके शहर की
बहुत याद आती हैं उसके शहर की
अब मेरा उधर जाना नहीं होता हैं
कोई तो खबर दो उसके शहर की
कब कहाँ किधर से वो आती जाती हैं
हर गली याद है यार उसके शहर की
कभी तो वो टकरा भी जाती हैं मुझसे
गलियां सकड़ी है यार उसके शहर की
इक रात गया था मिलने खिड़की से
मुझे पुलिस ढूंढ़ रही हैं उसके शहर की
ख़ास चर्चे हैं “संगम” की महोब्बत के
घर-घर,गली-गली में उसके शहर की
शुक्रिया
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