कविता :- आओ -ना फिर से तुम
विधा :- कविता
शीर्षक :- ''आओ-ना फिर से तुम"
आओ - ना फिर से तुम
बचपन में खो जाते हैं,
तुम आओ मेरी गली
हम तेरी गली आते हैं ,
दड़ी, कंचे, कंकर खेलें
रोज पार्क में लग जाये
अपने -अपनों के मेले
खेल-खेल में खेल-खेलें
बन जाए
कोई गुरु कोई चेले
सभी साथी,साथ रहे
कभी ना रहे अकेले,
आओ मिलकर
सब खेल खेलें
क्यों ? यह बचपन
किताबों में दबता जा रहा है,
विज्ञान का युग है साहब
बचपन मिटता जा रहा है!
आओ- ना फिर से तुम
बचपन में खो जाते हैं
हम एक -दूजे के हो जाते हैं!!
;- *ओम प्रकाश लववंशी 'संगम'*
हिंदी लेखक डॉट कॉम की *"अनुभव"* मासिक पत्रिका जून अंक में *''आओ -ना फिर से तुम''* प्रकाशित
डाउनलोड लिंक: https://bit.ly/anubhav-june2020
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