कविता - लक्ष्य पाना है
प्रखर गूँज प्रकाशन की मासिक पत्रिका "विचार वीथिका में प्रकाशित
#लक्ष्य पाना है#
जब तूने लक्ष्य बना ही लिया
तो अब क्यों रुकता हैं,
जब ऊपर उठना ही हैं
तो अब क्यों झुकता हैं।
ठान लिया मन में, अब मंजिल पाना हैं,
करते करते अभ्यास, सब हल पाना हैं,
वक़्त भी अब ज्यादा शेष नहीं
परिस्थितियां भी तेरी विशेष नहीं,
तू सारा ध्यान लगा लक्ष्य पर
सारी विचलित बातें बिसरा कर,
तेरी टक्कर में कोई आ न सके
तू विविध ज्ञान का पहरा कर।
दिन-रात एक करना होगा
संघर्षों को भी सहना होगा
मेहनत में कोई कमी ना रहे
क़िताबों में तुझको खोना होगा!
#ओम प्रकाश लववंशी संगम#
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