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Showing posts from June, 2020

आओ ना फिर से तुम (गाँव के बाहर )

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विधा- कविता शीर्षक:- आओ -ना फिर से तुम  गाँव  के बाहर  पहाड़ों से  रिसकर आये बारिश के पानी से  लबालब भरा हुआ  मिट्टी का तालाब,  किनारे पर  छोटे-छोटे पौधे  और उन पर  रंग बिरंगे फूल, फूलों के इर्द-गिर्द  मचलती हुई तितलियाँ,  गोधूलि बेला  सूरज अपने घर को जाता हुआ , और जंगल से  पशुओं का आना,  उन सुनहरे  साँझ के लम्हों में  तेरे संग बातें करना,  कौन अभागा होगा  जो भूल पायेगा यह सब,  वक्त भले ही ना आये फिर से ,  महसूस  तो किया होगा यह सब तुमने फिर से  कभी ना भूल पाने वाले  चिर स्थाई क्षण हो गये हैं जिंदगी के,  मैं तो चाहता हूँ इनको दोहराएं फिर से हम,  वही बचपन के किस्से  वहीं गाँव, वहीं मौज मस्ती!! लेखक परिचय  अनुभव पत्रिका जुलाई 2019 में प्रकाशित नाम - ओम प्रकाश लववंशी

उसके शहर की

विधा- ग़ज़ल शीर्षक- उसके शहर की  कुछ तो ख़ास बात हैंं उसके शहर की बहुत याद आती हैं    उसके शहर की अब मेरा उधर जाना नहीं होता हैं कोई तो खबर दो  उसके शहर की कब कहाँ किधर से वो आती जाती हैं हर गली याद हैंं यार उसके शहर की कभी तो वो टकरा भी जाती हैं मुझसे गलियां सकड़ी हैंं यार उसके शहर की इक रात गया था मिलने खिड़की से मुझे पुलिस ढूंढ़ रही हैं उसके शहर की ख़ास चर्चे हैं  'संगम' की महोब्बत के  घर घर,गली गली में उसके शहर की लेखक परिचय  नाम - ओम प्रकाश लववंशी'संगम' अनुभव पत्रिका अगस्त 2019 में प्रकाशित

कोई कुछ भी कहे

विधा    :-  गज़ल  शीर्षक :-  कोई कुछ भी कहे कोई कुछ भी कहे कहने दीजिए  हम जैसे है वैसे ही रहने दीजिए जमाने भर की बातों का क्या हमें अपने काम करने दीजिए सागर बनाकर खारा ना करो मीठा झरना हूँ बहने दीजिए  तुम्हारी  कब से सुन रहा हूँ  अब तो मुझे भी कहने दीजिए ये आँसू खुशी के आँसू हैं  ये बहते हैं तो बहने दीजिए  इतने भर से ही रुकना नहीं  अभी तो आगे बढ़ने दीजिये अभी हिम्मत हारा नहीं हूँ मैं  हौसला हैं मुझे लड़ने दीजिए तुम्हारे कसमें वादे तुम रखो तुमसे ना होगा रहने दीजिये अनुभव मई 2019 में प्रकाशित लेखक परिचय  नाम - ओम प्रकाश लववंशी साहित्यिक उपनाम - 'संगम' पता- कोटा , राजस्थान 

इश्क तुमसे हैं

इश्क तुमसे हैं ये दिखाना तो नहीं हैं  जमाने भर को ये बताना तो नहीं हैं!!  खामोश आँखों के राज तुम समझो जग जाहिर कर जताना तो नहीं हैं तुमने खुब सता लिया मुझको अब मुझे और सताना तो नहीं हैं नजरों मे डालकर नजरें रखो नजरें हमसे चुराना तो नहीं हैं यूं खफ़ा- खफ़ा से क्यो रहते हो दिन हिज्र के दिखाना तो नहीं हैं लाली लगाकर आये हो लबों पे लबों से लब बचाना तो नहीं हैं हिज्र के बाद क्या होगा वो देखेंगे  अभी से अश्क बहाना तो नहीं हैं मेरे बाद मेरा रकीब आना तो हैं  अभी से उसका आना जाना तो नहीं हैं! ! !  अनुभव अप्रेल 2019 प्रकाशित - ओम प्रकाश लववंशी संगम

कविता - लक्ष्य पाना है

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प्रखर गूँज प्रकाशन की मासिक पत्रिका "विचार वीथिका में प्रकाशित       #लक्ष्य पाना है# जब तूने लक्ष्य बना ही लिया तो अब क्यों रुकता हैं, जब ऊपर उठना ही हैं तो अब क्यों झुकता हैं। ठान लिया मन में, अब मंजिल पाना हैं, करते करते अभ्यास, सब हल पाना हैं, वक़्त भी अब ज्यादा शेष नहीं परिस्थितियां भी तेरी विशेष नहीं, तू सारा ध्यान लगा लक्ष्य पर सारी विचलित बातें बिसरा कर, तेरी टक्कर में कोई आ न सके तू  विविध ज्ञान का पहरा कर। दिन-रात एक करना होगा संघर्षों को भी सहना होगा मेहनत में कोई कमी ना रहे क़िताबों में तुझको खोना होगा! #ओम प्रकाश लववंशी संगम#

गजल:- नया सफर

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विधा - ग़ज़ल शीर्षक- नया सफ़र फ़िर से शुरु नया सफ़र कर रहा हूँ  इस तरह खत्म दिसंबर कर रहा हूँ  खूब हुई दोस्ती,इश्क,महोब्बत की बातें  सालभर की बातें रिमेंबर कर रहा हूँ  मेरे अपनों से मैं माफ़ी मांग रहा हूँ  इस तरह मुकम्मल दिसंबर कर रहा हूँ  सालभर की सब गलतियाँ सुधार कर खुद को गुड बेस्ट से बेटर कर रहा हूँ  ख्वाबों खयालों मे हर वक्त याद किया हैं  अब तेरी नजरों मे लव लेटर कर रहा हूँ  इतनी सर्द रातें हैं पानी बर्फ़ हो गया मैं बर्फ़ मे खुद को हीटर कर रहा हूँ  खुद ही खुद को इश्क पढ़ाकर 'संगम'  खुद को ही इश्क का टीचर कर रहा हूँ         लेखक परिचय  नाम - ओम प्रकाश लववंशी 'संगम' अनुभव पत्रिका नवम्बर दिसम्बर 2019 अंक में प्रकाशित

कविता:- हमको मंजिल पाना है

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शीर्षक- हमको मंजिल पाना है कोशिशें कभी कम ना होगी           छोटी हार से       आँखे नम ना होगी,     जारी है सफ़र हमारा चाहत मंजिल से कम ना होगी।            कहने वाले तो            कुछ भी कहते हैं,       मंजिल के लिए ही तो       हम सारे दर्द सहते हैं।              हमें पता हैं         हमें क्या करना हैं?          फिर फालतू की      बातों से क्यों डरना हैं।          पैर भी फिसलेंगे          साँसे भी फूलेगी   लेकिन हमने जो ठान लिया           वो तो करना हैं,      हमको मंजिल पाना हैं।      हमको मंजिल पाना हैं। लेखक परिचय  नाम - ओम प्रकाश लववंशी 'संगम' अनुभव पत्रिका अप्रेल 2020 अंक में प्रकाशित

गजल:- अच्छा नहीं लगता

*'अच्छा नहीं लगता'* तेरे घर ये ताला अच्छा नहीं लगता तेरा  चले जाना अच्छा नहीं लगता तुम छत पर कुछ देर रुका तो करो आकर चले जाना अच्छा नहीं लगता जो तुम रूठकर यूँ दूर बैठ जाते हो तेरा मुँह फुलाना अच्छा नहीं लगता जब मैं किसी दोस्त से बात करूं तो तेरा आँख दिखाना अच्छा नहीं लगता रजा क्या है दिल की अब बता भी दो  मुझसे छुपाना अच्छा नहीं लगता अनुभव पत्रिका मई 2020 अंक में प्रकाशित :-  *ओम प्रकाश लववंशी संगम*

कविता :- आओ -ना फिर से तुम

विधा :- कविता शीर्षक :- ''आओ-ना फिर से तुम" आओ - ना फिर से तुम बचपन में खो जाते हैं,  तुम आओ मेरी गली हम तेरी गली आते हैं ,  दड़ी, कंचे, कंकर खेलें  रोज पार्क में लग जाये अपने -अपनों के मेले  खेल-खेल में खेल-खेलें  बन जाए  कोई गुरु कोई चेले सभी साथी,साथ रहे  कभी ना रहे अकेले,  आओ मिलकर  सब खेल खेलें  क्यों ? यह बचपन  किताबों में दबता जा रहा है, विज्ञान का युग है साहब बचपन मिटता जा रहा है! आओ- ना फिर से तुम  बचपन में खो जाते हैं  हम एक -दूजे के हो जाते हैं!! ;-  *ओम प्रकाश लववंशी 'संगम'* हिंदी लेखक डॉट कॉम की *"अनुभव"* मासिक पत्रिका जून अंक में  *''आओ -ना फिर से तुम''*  प्रकाशित  डाउनलोड लिंक: https://bit.ly/anubhav-june2020